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Wednesday, Jul 24, 2024,

Dharm Sanskriti / Festival / India / Odisha / Puri
जगन्नाजथ रथ यात्रा का महत्व और इतिहास

By  Agcnnnews Team /
Sat/Jul 06, 2024, 04:44 AM - IST -86

  • जगन्नाथ रथ यात्रा निकालने की परम्परा 12वीं सदी से भी अधिक प्राचीन है।
  • रथ यात्रा का साक्षात दर्शन करने भर से ही 1000 यज्ञों का पुण्य फल मिल जाता है।
  • भगवान जगन्ना थ के रथ में कुल 16 पहिए होते हैं।
Puri/

उड़ीसा/जगन्नाथ रथ यात्रा का आरंभ इस साल 7 जुलाई से हो रहा है। जगन्नाथ रथ यात्रा का हर साल आषाढ़ मास के शुक्‍ल पक्ष की द्वितीया से होता है और यह रथ यात्रा दशमी तिथि को समाप्त होती है। भगवान श्रीकृष्ण के अवतार माने जाने वाले भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलराम और अपनी बहन सुभद्रा के साथ हर साल उड़ीसा के पुरी शहर में रथ की सवारी करने निकलते हैं और इस यात्रा को दुनिया भर में रथ यात्रा के नाम से जाना जाता है। जगन्‍नाथ जी की रथयात्रा में शामिल होने का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना जाता है। रथ यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन से श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है। यहां पुरी में भगवान जगन्‍नाथ का 800 साल पुराना मंदिर है और यहां भगवान श्रीकृष्‍ण जगन्‍नाथ के रूप में विराजते हैं।

12वीं सदी में शुरू हुई थी जगन्नाथ रथ यात्रा

इतिहासकारों का मानना है कि पुरी में स्थित जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत 12वीं सदी में की गई थी। ओडिशा में जगन्नाथ रथ यात्रा बहुत बड़ा उत्सव माना जाता है। माना जाता है कि आषाढ़ महीने में भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ धरती पर विचरण करके अपने भक्तों के दुख-दर्द को देखकर उन्हें दूर करते हैं। इतिहासकारों से अलग पुरी के साधु-संतों की मानें, तो जगन्नाथ रथ यात्रा निकालने की परम्परा 12वीं सदी से भी अधिक प्राचीन है।

कैसे शुरू हुई जगन्नाथ रथ यात्रा

धार्मिक मान्‍यता के अनुसार एक बार बहन सुभद्रा ने अपने भाइयों कृष्‍ण और बलरामजी से नगर को देखने की इच्‍छा प्रकट की। फिर दोनों भाइयों ने बड़े ही प्‍यार से अपनी बहन सुभद्रा के लिए भव्‍य रथ तैयार करवाया और उस पर सवार होकर तीनों नगर भ्रमण के लिए निकले थे। रास्‍ते में तीनों अपनी मौसी के घर गुंडिचा भी गए और यहां पर 7 दिन तक रुके और उसके बाद नगर यात्रा को पूरा करके वापस पुरी लौटे। तब से हर साल तीनों भाई-बहन अपने रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं और अपनी मौसी के घर गुंडीचा मंदिर जाते हैं। इनमें सबसे आगे बलराम जी का रथ, बीच में बहन सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे जगन्‍नाथजी का रथ होता है।

जगन्‍नाथ यात्रा का महत्‍व

भगवान जगन्‍नाथ और उनके भाई-बहन के रथ नीम की परिपक्‍व और पकी हुई लकड़ी से तैयार किए जाते हैं। इसे दारु कहा जाता है। रथ को बनाने में केवल लकड़ी को छोड़कर किसी अन्‍य चीज का प्रयोग नहीं किया जाता है। भगवान जगन्‍नाथ के रथ में कुल 16 पहिए होते हैं और यह बाकी दोनों रथों से बड़ा भी होता है। रथ यात्रा में कुछ धार्मिक अनुष्‍ठान भी किए जाते हैं। मान्‍यता है कि इस रथ यात्रा का साक्षात दर्शन करने भर से ही 1000 यज्ञों का पुण्य फल मिल जाता है। जब तीनों रथ यात्रा के लिए सजसंवरकर तैयार हो जाते हैं तो फिर पुरी के राजा गजपति की पालकी आती है और फिर रथों की पूजा की जाती है। उसके बाद सोने की झाड़ू से रथ मंडप और रथ यात्रा के रास्‍ते को साफ किया जाता है।

हर साल इस मजार पर क्‍यों रुकता है रथ

 यह रथ भगवान जगन्‍नाथ का रथ अपनी यात्रा के दौरान मुस्लिम भक्‍त सालबेग की मजार पर कुछ देर के लिए जरूर रुकता है। माना जाता है कि एक बार जगन्‍नाथजी का एक भक्‍त सालबेग भगवान के दर्शन के लिए पहुंच नहीं पाया था। फिर उसकी मृत्‍यु के बाद जब उसकी मजार बनी तो वहां से गुजरते वक्‍त रथ खुद ब खुद वहां रुक गया। फिर उसकी आत्‍मा के लिए शांति प्रार्थना की गई तो उसके बाद रथ आगे बढ़ पाया। तब से हर साल रथयात्रा के दौरान रास्‍ते में पड़ने वाली सालबेग की मजार पर जगन्‍नाथजी का रथ जरूर रुकता है।

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